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नेता और हमारी पीडाएँ.......

Posted On: 8 Aug, 2013 कविता में

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खंडित होगी स्वर मौलिकता

तपस्वी भी तप छोड रहे

इस भारत भू पर अब प्रतिपल

मानव अपना दम तोड रहें

सहता है क्या

सहते रहता

ये भी कोई सहना है

शत्रु के समक्ष क्या हम सबको

आंसू को ही बहाना है

आतंकी क्रीडाओं से

त्रस्त जन जन

बूढा भारत भी बोल उठा-

क्या अब भी मुझको जीना है

क्या अब भी बाकी है पीडाएँ

वो प्रलंयकारी क्रीडाएँ

अ बतन होकर, ये तन ही नहीं

क्या अब और कुछ भी सहना है

शत्रु के समक्ष अब हमको

आंसू को बहाना है

विस्फोटो को देख देख

क्या दिल में नहीं विस्फोट उठे

हे! प्रजातंत्र के रखवालों

क्या तुममें नहीं कोई जोश उठे

सीमा पर तो सेनाएँ लडती

तुम तो बस घर में रहते हो

हे देश चलाने वालों तुम

क्यूं खुद को देश का कहते हो

माताओं के सिंदूरों को

जब बदला लाशों के ढेरों में

क्या मंूद चुके थे नेत्रों को

अपनी काली करतूतो से

जब देश नहीं चला सकते

तो क्यूं गद्दी पर बैठे हो

भारत के पावन सिंहासन पर

क्यूं कलंक लगवाते हो

मानव की जब पहचान नहीं

खुद को क्यूं मानव कहते

हे प्रजातंत्र के दूषित जीव

फिर भी क्यूं तुम जीना चाहते

फिर भी क्यूं तुम जीना चाहते

-सत्येन्द्र कात्यायन

नेता और हमारी पीडाएँ
खंडित होगी स्वर मौलिकता
तपस्वी भी तप छोड रहे
इस भारत भू पर अब प्रतिपल
मानव अपना दम तोड रहें
सहता है क्या
सहते रहता
ये भी कोई सहना है
शत्रु के समक्ष क्या हम सबको
आंसू को ही बहाना है
आतंकी क्रीडाओं से
त्रस्त जन जन
बूढा भारत भी बोल उठा-
क्या अब भी मुझको जीना है
क्या अब भी बाकी है पीडाएँ
वो प्रलंयकारी क्रीडाएँ
अ बतन होकर, ये तन ही नहीं
क्या अब और कुछ भी सहना है
शत्रु के समक्ष अब हमको
आंसू को बहाना है
विस्फोटो को देख देख
क्या दिल में नहीं विस्फोट उठे
हे! प्रजातंत्र के रखवालों
क्या तुममें नहीं कोई जोश उठे
सीमा पर तो सेनाएँ लडती
तुम तो बस घर में रहते हो
हे देश चलाने वालों तुम
क्यूं खुद को देश का कहते हो
माताओं के सिंदूरों को
जब बदला लाशों के ढेरों में
क्या मंूद चुके थे नेत्रों को
अपनी काली करतूतो से
जब देश नहीं चला सकते
तो क्यूं गद्दी पर बैठे हो
भारत के पावन सिंहासन पर
क्यूं कलंक लगवाते हो
मानव की जब पहचान नहीं
खुद को क्यूं मानव कहते
हे प्रजातंत्र के दूषित जीव
फिर भी क्यूं तुम जीना चाहते
फिर भी क्यूं तुम जीना चाहते
-सत्येन्द्र कात्यायन

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